५७. रहू जहा में वही
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तेरी यादो से तन्हा कभी हो जाऊं तो सही,
फिर चैनसे शायद, तो में रहे पाऊंगा कही,

एक तो तू हे सुनहरे ख्वाबोसी उमीद मेरी,
जीवनमें बिन तेरे और कोई खास तो नहीं,

जन्नते और जहन्नुम जैसी सिर्फ बाते हे,
वहा न में जा पाया, नाही जाकर हे तू रही,

मानता हूं कई गम हे, इसकदर जिंदगी में,
दर्देकी इंतेहा क्या थी इश्क में हमने सही,

अनियंत्रित जीवनमें कई पड़ाव बाकी है,
आखरी पड़ाव तो लेकिन बस रहेगा यही,

तेरी यादो से तन्हा कभी हो जाऊं तो सही,
तुजे साथ ले जाऊंगा, रहा हु जहा में वही,

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’
( ११:३३ दोपहर, ११ मार्च २०१७ )
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© Poem No. 57
Language – Hindi
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