५५. शायद अब बिखरे…..।।
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शायद अब बिखरे हालात ठीक नहीं होंगे,

रात आती जाती रहेगी, इस जिंदगीमें युही,
फिर वो दिन भी अब रंगीन साथ नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।

मयकश पैमाने आज कल तुम्हारी यादो के,
फिर बिताये पल एकदूजेको याद नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।

जरुरी तो नहीं, आंसू खुद पोंछ लिया करे,
फिरसे तुजे सहलाते हुए मेरे हाथ नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।

कहते तो लोग कायनात छोड़ जाते इश्कमें,
लेकिन उन हाल मे अपनेभी साथ नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।

कुछ लम्हे आजभी कैद, उनकी महोब्बतमें,
फिर भी अब वो, दिलसे आज़ाद नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।

बात नहीं करता अब में इश्क महोब्बतकी,
क्या पता, दिलके ज़ज़्बात साथ नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।

नींदे तो अब आंखो में, आती जाती रहेंगी,
फिर वो हसिन सपने अब साथ नहीं होंगे,
शायद अब बिखरे…..।।
शायद अब बिखरे…..।।

~ सुलतान सिंह ‘जीवन:
( १०:१० रात्रि, २७ दिसम्बर २०१६ )
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© कविता क्रमांक :- 55
लेखन भाषा – हिन्दी (देवनागरी)
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