५२. खो गया है।
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आज कल वो मासुम सा वक़्तभी खो गया है,
कैसे बताऊ ऐ दोस्त की, बचपन खो गया है,

पहले जो आती थी हर एक आलम में नींदे,
आजकल तो शायद वोही आलम खो गया है,

समंदर की तरह शांत था कभी ये जीवनभी,
आजकल मानो पानी का सैलाब खो गया है,

कही नदिया दौड़ा करती थी बदलो में भरी,
आजकल वो भरा हुआ आसमान खो गया है,

ऐय खुदा क्या बनाई है तूने कायनात यहाँ,
अल्ला तो ठीक, वजुद-ए-इंसान खो गया है,

– सुलतान सिंह ‘जीवन:
( १२:१७ रात्रि, ११ दिसम्बर २०१६ )
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© कविता क्रमांक :- 52
लेखन भाषा – हिन्दी (देवनागरी)
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