५९. रहने दो तो अच्छा है।
—————————————-
मेरी उन बातों को यादों में ही रहने दो तो अच्छा हे,
कुछ हालातो को हालात में ही रहने दो तो अच्छा है,

भूले हे वो हमें, या शायद हमने ही भुला दिया होगा,
इन राजो को बीते राजो में ही रहने दो तो अच्छा है,

बहोत आती है, अब आज कल यादे उनकी हमें भी,
उन यादोको अपने हाल में ही रहने दो तो अच्छा है,

पूछ लेती थी कभी बिखरे पड़े हाल को सवारु कैसे,
उन हलातको अब बिखरते ही रहने दो तो अच्छा है,

जरुरत नहीं हे अब हमें दुप्पटे की आंसू छुपाने को,
गिरते आंसुओको आँखों में ही रहने दो तो अच्छा है,

क्या कशिश तेरी आंखोंकी, मुस्कान और होठोकी,
उन कशिश को अरमानो में ही रहने दो तो अच्छा है,

बिखर ही जायेंगे अगर फिर हुई कोशिशे जोड़नेकी,
टुटाफूटा सा अब टुकड़ो में ही रहने दो तो अच्छा है,
—————————————-
~ सुलतान सिंह ‘जीवन’
( १:१५ दोपहर, १४/११/२०१६ )
—————————————-
© कविता क्रमांक :- 49
लेखन भाषा – हिन्दी (देवनागरी)
—————————————-

Advertisements