पार न करो…

48. पार न करो
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नजर से नजर को तुम पार न करो,
इस कदर आँखोंसे तुम वार न करो,

देखलो कभी हमे पास आकर तुम,
नजरे दिल के अब आरपार न करो,

कशिश हे तेरी इन सुन्न निगाहों में,
दिन ये तो आजका नाकाम न करो,

महोब्बत तेरी आंखो में जलकती हे,
अंजान होने का तुम ऐलान न करो,

कुछ नहीं है हमारी तुम्हारी महोबत,
बस साथ रहने से इनकार न करो,

नजर से नजर को अब पार न करो,
इस कदर दिलपर तुम वार न करो,

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’
(११:३२, १० नवम्बर ३०१६)
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© Poem No. 48
Language – Hindi
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