हम न हो…

47. हम न हो,
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कभी तो मान लिया कर ऐ जानेमन,
कल तुम रहो और शायद हम न हो,

फिर चाहे मिले ये अंजाम महोबतमें,
दिल मे दर्द, आँखे शायद नम न हो,

गुजरता रहेगा यूं ही ये सिलसिला,
महोब्बत का शायद कोई गम न हो,

दर्द पिता रहता हु, कभी ख़ुशी मिले,
इंसाफ खुदाकाभी शायद कम न हो,

कभी तो जान लिया कर ऐ जानेमन,
कल तुम रहो और शायद हम न हो,

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’
( १२:४९, २५ अक्टूबर २०१६ )

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© Poem No. 47
Language – Hindi
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