सदा-ए-इश्क

45. शीर्षक – सदा-ए-इश्क
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सुना है आजकल फिर वो आहे भरने लगी है,
शुकर हे खुदा कोई हे जो मुजपे मरने लगी है,

यादोके भी मयखाने नहीं सजाया करते हम,
और वो मयखानोंमे ही सपने सजाने लगी है,

जिंदा लोग अब नहीं समझते सदा-ए-इश्क,
कब्रस्तानमें अब लाशे महोबत करने लगी है,

नफरत जिन्हें थी इश्क सजावट के नाम से,
वोही जाने क्यों अब सजने सवरने लगी हे,

कभी वहा सूखा और भीगासा ही मंजर था,
आज पानीमें भी यहा आग सुलगने लगी हे,

कही सदाए इश्क को भी लोग नफ़रत कहते,
आज उसी इश्क की दुआएं नीकलने लगी हे,

पहले कहती थी बेवजह हे ये इश्क़ महोबत,
इश्क के जाम अब खुद लगा लिया करती हे,
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~ सुलतान सिंह ‘जीवन’
( १२:३९, २ ओक्टूबर २०१६ )
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© Poem No. 45
Language – Hindi
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