कही सूरज को ढलते देखा है,
कही मौसमभी बदलते देखा है,

ना जा ऐ महबूब दिलसे दूर यु,
इश्क को चितापे जलते देखा है,

वो शायद अपना ही था कोई,
आज उसे रूप बदलते देखा है,

कही होगा वो सतरंगी प्रियतम,
हर किसीको रंग बदलते देखा है,

चाहा था जिसे कुछ इस कदर,
अपनी पहचान बदलते देखा है,

रहे गया था कोई मेरी राह में,
उसे अब राह बदलते देखा है,

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’
( ११:१२, १३ सितंबर २०१६)

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